Sunday, November 14, 2010
Monday, November 1, 2010
मैं ऐसा भारत चाहता हूं.................
मैं ऐसा भारत चाहता हूं जहां भय का ऐसा वातावरण न हो जैसा आज चारों तरफ छाया है, जहां उत्पादन या व्यापार के कठिन कार्य में लगे ईमानदार लोग अधिकारियों, मंत्रियों और पार्टी आकाओं के हाथों बर्बाद होने के भय के बगैर अपना काम कर सकें।
मैं ऐसा भारत चाहता हूं जहां प्रतिभा और ऊर्जा के फलने-फूलने की पूरी गुंजाइश हो, इसके लिए विशेष मंजूरी हासिल करने की खातिर उन्हें अफसरों और मंत्रियों के आगे एड़ियां न रगड़नी पड़ें, और जहां भारत और विदेश का खुला बाजार उनके प्रयत्नों का मूल्यांकन करे।
मैं चाहता हूं परमिट-लाइसेंस राज का घना कोहरा हमारे सीने पर न बैठा रहे। मैं चाहता हूं इस परम शक्तिशाली राज्यवाद से मुक्ति मिले और सरकार के हाथों में सिर्फ इतनी ताकत हो जो उसके उचित कार्यो के लिए जरूरी है।
मैं चाहता हूं कि हमें सरकारी व्यवस्था के नाकारापन से मुक्ति मिले और निजी प्रबंधन की प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्था मामलों को संभाल सके।
मैं चाहता हूं कानून और नीतियों का लागू करने के लिए नियुक्त अधिकारी सत्तारूढ़ पार्टी के आकाओं के दबावों से मुक्त हों और उनमें वही निर्भीक ईमानदारी बहाल हो जो कभी उनमें हुआ करती थी।
नेहरू ने कहा कि परमिट मांगने के लिए कोई भी आदमी आज तक उनके पास नहीं आया। सही है। लेकिन उनके पास 150 मंत्रियों और अनगिनत पेशेवर कांग्रेसियों की फौज है, जो कोटा और परमिट दिलाने में लोगों की मदद के इस नए व्यवसाय में लगी है।
मैं चाहता हूं सभी को असलियत में बराबर के अवसर मिलें और परमिट-लाइसेंस राज के जरिये निर्मित निजी एकाधिकारवाद खत्म हो।
मैं ऐसा भारत चाहता हूं, जहां किसानों को धमकाकर या फुसलाकर उनकी जमीनें देने के लिए मजबूर नहीं किया जाए. ताकि सहकारी खेती के जरिये हवा में किले बनाए जा सकें।
मैं संपत्ति, जमीन व अन्य सभी मिल्कियतों के स्वामित्व की सुरक्षा चाहता हूं ताकि उनके ऊपर हमेशा खतरे की तलवार न लटकी रहे कि उनकी संपत्ति या जमीन कभी भी हथिया ली जाएगी, वह भी न्यायिक प्राधिकार द्वारा सही सिद्धांतों के आधार पर तय न्यायोचित व पूर्ण मुआवजा दिए बगैर, महज राजनीतिक विधान के आदेश पर।
मैं चाहता हूं कि मूलभूत अधिकारों को उनके मौलिक रूप में बहाल किया जाए और उन्हें अक्षुण्ण रखा जाए।
मैं ऐसा भारत चाहता हूं जहां भारी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर निजी पूंजी के निर्माण में बाधा न बनें और इस तरह उद्यमशीलता और पहल को हतोत्साहित न करें।
मैं ऐसा भारत चाहता हूं जहां केंद्र का बजट मुद्रास्फीति और महंगाई को बढ़ाने वाला न हो।
मैं ऐसा भारत चाहता हूं जहां सरकार पूंजी निवेश पर कर लगाकर वर्तमान पीढ़ी की जिंदगी को मुश्किल न बनाए।
मैं चाहता हूं बड़े बिजनेस की धनशक्ति को राजनीति से अलग रखा जाए। लोकतंत्र का विकास वैसे भी कठिन कार्य है, इसे धन-बल से बर्बाद नहीं होने दिया जाए और महंगे चुनावों से प्रहसन में नहीं बदला जाए और बड़े बिजनेस विशेष सुविधाओं के बदले में या राज्य व्यवस्था के नियामक अधिकारों के भय से सत्तारूढ़ पार्टी को धन-बल से सहायता न करें.।
मैं चाहता हूं उदारता और परोपकार की भावना को खुलकर खेलने की जगह मिले, ऊंचे व बहुत ज्यादा करों, अति-केंद्रीयकरण और कल्याणकारी योजनाओं पर सरकारी एकाधिकार के माध्यम से इसका गला न घोंटा जाए।
मैं चाहता हूं कि सरकार को उसकी सीमाओं का पता हो और वह विनम्रता से अपने कामों को अंजाम दे। साथ ही नागरिक उत्तराधिकार में प्राप्त पारंपरिक माध्यमों से आध्यात्मिकता का अनुभव करे।
मैं चाहता हूं कि सत्ता में चाहे जो पार्टी हो, उसके विरोध में एक मजबूत पार्टी अवश्य रहे, ताकि लोकतंत्र के पहिये सीधी सड़क पर सुगमता से दौड़ सकें।
मैं ऐसा भारत चाहता हूं जो विदेशों में अपनी नैतिक ऊंचाई दोबारा हासिल कर सके और मैं नहीं चाहता कि हमारी जनता को इस धोखे में रखा जाए कि गांधी जी के समय में जो नैतिक सत्ता हमने हासिल की थी, वह अब भी बरकरार है।
{सी राजगोपालाचारी के 1961 में लिखे एक निबंध से }
मैं ऐसा भारत चाहता हूं जहां प्रतिभा और ऊर्जा के फलने-फूलने की पूरी गुंजाइश हो, इसके लिए विशेष मंजूरी हासिल करने की खातिर उन्हें अफसरों और मंत्रियों के आगे एड़ियां न रगड़नी पड़ें, और जहां भारत और विदेश का खुला बाजार उनके प्रयत्नों का मूल्यांकन करे।
मैं चाहता हूं परमिट-लाइसेंस राज का घना कोहरा हमारे सीने पर न बैठा रहे। मैं चाहता हूं इस परम शक्तिशाली राज्यवाद से मुक्ति मिले और सरकार के हाथों में सिर्फ इतनी ताकत हो जो उसके उचित कार्यो के लिए जरूरी है।
मैं चाहता हूं कि हमें सरकारी व्यवस्था के नाकारापन से मुक्ति मिले और निजी प्रबंधन की प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्था मामलों को संभाल सके।
मैं चाहता हूं कानून और नीतियों का लागू करने के लिए नियुक्त अधिकारी सत्तारूढ़ पार्टी के आकाओं के दबावों से मुक्त हों और उनमें वही निर्भीक ईमानदारी बहाल हो जो कभी उनमें हुआ करती थी।
नेहरू ने कहा कि परमिट मांगने के लिए कोई भी आदमी आज तक उनके पास नहीं आया। सही है। लेकिन उनके पास 150 मंत्रियों और अनगिनत पेशेवर कांग्रेसियों की फौज है, जो कोटा और परमिट दिलाने में लोगों की मदद के इस नए व्यवसाय में लगी है।
मैं चाहता हूं सभी को असलियत में बराबर के अवसर मिलें और परमिट-लाइसेंस राज के जरिये निर्मित निजी एकाधिकारवाद खत्म हो।
मैं ऐसा भारत चाहता हूं, जहां किसानों को धमकाकर या फुसलाकर उनकी जमीनें देने के लिए मजबूर नहीं किया जाए. ताकि सहकारी खेती के जरिये हवा में किले बनाए जा सकें।
मैं संपत्ति, जमीन व अन्य सभी मिल्कियतों के स्वामित्व की सुरक्षा चाहता हूं ताकि उनके ऊपर हमेशा खतरे की तलवार न लटकी रहे कि उनकी संपत्ति या जमीन कभी भी हथिया ली जाएगी, वह भी न्यायिक प्राधिकार द्वारा सही सिद्धांतों के आधार पर तय न्यायोचित व पूर्ण मुआवजा दिए बगैर, महज राजनीतिक विधान के आदेश पर।
मैं चाहता हूं कि मूलभूत अधिकारों को उनके मौलिक रूप में बहाल किया जाए और उन्हें अक्षुण्ण रखा जाए।
मैं ऐसा भारत चाहता हूं जहां भारी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर निजी पूंजी के निर्माण में बाधा न बनें और इस तरह उद्यमशीलता और पहल को हतोत्साहित न करें।
मैं ऐसा भारत चाहता हूं जहां केंद्र का बजट मुद्रास्फीति और महंगाई को बढ़ाने वाला न हो।
मैं ऐसा भारत चाहता हूं जहां सरकार पूंजी निवेश पर कर लगाकर वर्तमान पीढ़ी की जिंदगी को मुश्किल न बनाए।
मैं चाहता हूं बड़े बिजनेस की धनशक्ति को राजनीति से अलग रखा जाए। लोकतंत्र का विकास वैसे भी कठिन कार्य है, इसे धन-बल से बर्बाद नहीं होने दिया जाए और महंगे चुनावों से प्रहसन में नहीं बदला जाए और बड़े बिजनेस विशेष सुविधाओं के बदले में या राज्य व्यवस्था के नियामक अधिकारों के भय से सत्तारूढ़ पार्टी को धन-बल से सहायता न करें.।
मैं चाहता हूं उदारता और परोपकार की भावना को खुलकर खेलने की जगह मिले, ऊंचे व बहुत ज्यादा करों, अति-केंद्रीयकरण और कल्याणकारी योजनाओं पर सरकारी एकाधिकार के माध्यम से इसका गला न घोंटा जाए।
मैं चाहता हूं कि सरकार को उसकी सीमाओं का पता हो और वह विनम्रता से अपने कामों को अंजाम दे। साथ ही नागरिक उत्तराधिकार में प्राप्त पारंपरिक माध्यमों से आध्यात्मिकता का अनुभव करे।
मैं चाहता हूं कि सत्ता में चाहे जो पार्टी हो, उसके विरोध में एक मजबूत पार्टी अवश्य रहे, ताकि लोकतंत्र के पहिये सीधी सड़क पर सुगमता से दौड़ सकें।
मैं ऐसा भारत चाहता हूं जो विदेशों में अपनी नैतिक ऊंचाई दोबारा हासिल कर सके और मैं नहीं चाहता कि हमारी जनता को इस धोखे में रखा जाए कि गांधी जी के समय में जो नैतिक सत्ता हमने हासिल की थी, वह अब भी बरकरार है।
{सी राजगोपालाचारी के 1961 में लिखे एक निबंध से }
हिंदू महासभा ने संघ को बताया कायरों का संगठन ----khaskhabar.com
अयोध्या। अयोध्या में हुई हिंदू महासभा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में वीएचपी, संघ और भाजपा पर ताब़डतो़ड आरोप लगाए। बैठक में जहां संघ को कायरों का संगठन करार दे दिया वहीं निर्मोही अख़ाडा और हाशिम अंसारी की सुलह की पहल का स्वागत किया गया।
दरअसल हिंदू संगठनों का धीरे-धीरे आरएसएस और भाजपा से मोह भंग होता जा रहा है। रविवार को अयोध्या के जानकी निवास में जब हिंदू महासभा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हुई तो सदस्यों को गुस्सा बाहर आने लगा। अयोध्या में राम मंदिर मुद्दे पर संघ और भाजपा के रूख से नाराज हिंदू महासभा ने संघ को भाजपा का एजेंट और कायरों का संगठन करार दिया। महासभा ने वीएचपी, आरएसएस और भाजपा पर मंदिर निर्माण के नाम पर धन उगाही का आरोप लगाया और पैसा वापस करने की मांग की।
हिंदू महासभा अध्यक्ष ने कहा कि अयोध्या में मंदिर बनाने के लिए पहल जारी है। इस सिलसिले में दूसरे पक्ष को चिट्ठी लिखकर मदद करने की अपील की गई है। हिंदू महासभा की इस बैठक में सभी प्रांत के पदाधिकारी शामिल हुए। बैठक में अयोध्या मुद्दे पर पक्षकार हाशिम अंसारी और ज्ञानदास की सुलह की पहल का स्वागत किया गया।
http://www.khaskhabar.com/hindu-mahasabha-says-rss-is-timid-112010012254386641.html
दरअसल हिंदू संगठनों का धीरे-धीरे आरएसएस और भाजपा से मोह भंग होता जा रहा है। रविवार को अयोध्या के जानकी निवास में जब हिंदू महासभा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हुई तो सदस्यों को गुस्सा बाहर आने लगा। अयोध्या में राम मंदिर मुद्दे पर संघ और भाजपा के रूख से नाराज हिंदू महासभा ने संघ को भाजपा का एजेंट और कायरों का संगठन करार दिया। महासभा ने वीएचपी, आरएसएस और भाजपा पर मंदिर निर्माण के नाम पर धन उगाही का आरोप लगाया और पैसा वापस करने की मांग की।
हिंदू महासभा अध्यक्ष ने कहा कि अयोध्या में मंदिर बनाने के लिए पहल जारी है। इस सिलसिले में दूसरे पक्ष को चिट्ठी लिखकर मदद करने की अपील की गई है। हिंदू महासभा की इस बैठक में सभी प्रांत के पदाधिकारी शामिल हुए। बैठक में अयोध्या मुद्दे पर पक्षकार हाशिम अंसारी और ज्ञानदास की सुलह की पहल का स्वागत किया गया।
http://www.khaskhabar.com/hindu-mahasabha-says-rss-is-timid-112010012254386641.html
Tuesday, October 26, 2010
ਜਿਸ ਧਜ ਸੇ ਕੋਈ ਮਕਤਲ ਮੇਂ ਗਿਆ-ਫੈਜ਼ ਅਹਿਮਦ ਫੈਜ਼
ਜਿਸ ਧਜ ਸੇ ਕੋਈ ਮਕਤਲ ਮੇਂ ਗਿਆ,
ਵੋਹ ਸ਼ਾਨ ਸਲਾਮਤ ਰਹਿਤੀ ਹੈ
ਯੇ ਜਾਨ ਤੋ ਆਨੀ ਜਾਨੀ ਹੈ,
ਇਸ ਜਾਂ ਕੀ ਤੋ ਕੋਈ ਬਾਤ ਨਹੀਂ
ਮੈਦਾਨ-ਏ-ਵਫ਼ਾ ਦਰਬਾਰ ਨਹੀਂ,
ਯਾਂ ਨਾਮੋ ਨਸਬ ਕੀ ਪੂਛ ਕਹਾਂ
ਆਸ਼ਿਕ ਤੋ ਕਿਸੀ ਕਾ ਨਾਮ ਨਹੀਂ,
ਕੁਛ ਇਸ਼ਕ ਕਿਸੀ ਕੀ ਜ਼ਾਤ ਨਹੀਂ
...
ਗਰ ਬਾਜ਼ੀ ਇਸ਼ਕ ਕੀ ਬਾਜ਼ੀ ਹੈ
ਜੋ ਚਾਹੋ ਲਗਾ ਦੋ ਡਰ ਕੈਸਾ
ਗਰ ਜੀਤ ਗਏ ਤੋ ਕਿਆ ਕਹਿਨੇ,
ਹਾਰੇ ਭੀ ਤੋ ਬਾਜ਼ੀ ਮਾਤ ਨਹੀਂ
ਸਾਡੇ ਤਿਉਹਾਰ ਮਨਾਉਣ ਦੇ ਤਰੀਕੇ ਕਿੰਨੇ ਕੁ ਜਾਇਜ਼?.....ਭਗਵੰਤ ਮਾਨ
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ਇਹ ਗੱਲ ਸਾਨੂੰ ਛੇਵੀਂ-ਸੱਤਵੀਂ ਤੋਂ ਪੜ੍ਹਾਉਣੀ ਸ਼ੁਰੂ ਕਰ ਦਿੱਤੀ ਜਾਂਦੀ ਹੈ ਸਾਡਾ ਦੇਸ਼ ਤਿਉਹਾਰਾਂ ਤੇ ਮੇਲਿਆਂ ਦਾ ਦੇਸ਼ ਹੈ। ਸ਼ਾਇਦ ਹੀ ਕੋਈ ਅਜਿਹਾ ਹਫ਼ਤਾ ਜਾਂ ਮਹੀਨਾ ਹੋਵੇ, ਜਦ ਦੇਸ਼ ਵਿਚ ਕੋਈ ਨਾ ਕੋਈ ਤਿਉਹਾਰ ਜਾਂ ਮੇਲਾ ਨਾ ਲਗਦਾ ਹੋਵੇ। ਪਰ ਤੁਸੀਂ ਕਦੇ ਮੇਲੇ ਜਾਂ ਤਿਉਹਾਰ ਤੋਂ ਅਗਲੇ ਦਿਨ ਉਸ ਥਾਂ 'ਤੇ ਜਾ ਕੇ ਦੇਖਿਆ ਹੈ? ਲੱਖਾਂ ਦੀ ਗਿਣਤੀ 'ਚ ਲਿਫ਼ਾਫ਼ੇ, ਪਲਾਸਟਿਕ ਦੇ ਖਾਲੀ ਗਲਾਸ ਜਾਂ ਬਰਬਾਦ ਹੋਏ ਖਾਣੇ 'ਤੇ ਭਿਣਕਦੀਆਂ ਮੱਖੀਆਂ ਸਾਡੇ ਗੰਦਗੀ ਭਰੇ ਸਮਾਜ ਦੀ ਮੂੰਹ ਬੋਲਦੀ ਤਸਵੀਰ ਪੇਸ਼ ਕਰ ਰਹੀਆਂ ਹੁੰਦੀਆਂ ਹਨ। ਸਾਡੇ ਦੇਸ਼ ਦਾ ਸਭ ਤੋਂ ਵੱਡਾ ਤਿਉਹਾਰ ਦੀਵਾਲੀ ਨੂੰ ਮੰਨਿਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ। ਪਰ ਵਾਤਾਵਰਨ ਨੂੰ ਦੂਸ਼ਿਤ ਕਰਨ ਵਿਚ ਵੀ ਦੀਵਾਲੀ ਮੁਲਕ ਦਾ ਸਭ ਤੋਂ ਵੱਡਾ ਤਿਉਹਾਰ ਹੈ। ਮੈਂ ਇਹ ਨਹੀਂ ਕਹਿੰਦਾ ਕਿ ਦੀਵਾਲੀ ਨਹੀਂ ਮਨਾਉਣੀ ਚਾਹੀਦੀ ਪਰ ਮੈਂ ਦੀਵਾਲੀ ਮਨਾਉਣ ਦੇ ਤਰੀਕਿਆਂ ਨੂੰ ਬਦਲਣ ਬਾਰੇ ਵਿਚਾਰ ਸਾਂਝੇ ਕਰਨਾ ਚਾਹੁੰਦਾ ਹਾਂ।
ਹਰ ਸਾਲ ਦੀਵਾਲੀ 'ਤੇ ਅਰਬਾਂ ਰੁਪਏ ਦੇ ਪਟਾਕੇ ਚਲਾ ਕੇ ਆਪਣੀ ਸਾਹ ਲੈਣ ਵਾਲੀ ਹਵਾ ਨੂੰ ਦੂਸ਼ਿਤ ਕਰਕੇ ਅਸੀਂ ਇਕ-ਦੂਜੇ ਨੂੰ ਦੀਵਾਲੀ ਦੀਆਂ ਵਧਾਈਆਂ ਦਿੰਦੇ ਹਾਂ। ਜ਼ਹਿਰੀਲੀ ਹਵਾ, ਬਿਮਾਰੀਆਂ ਵੰਡਦੇ ਪਾਣੀ ਤੇ ਜ਼ਹਿਰੀਲੇ ਖਾਣਿਆਂ ਕਰਕੇ ਪਹਿਲਾਂ ਹੀ ਬਾਰੂਦ ਦੇ ਢੇਰ 'ਤੇ ਬੈਠਿਆਂ ਵਾਸਤੇ ਆਪਣੇ ਹੱਥੀਂ ਹੋਰ ਬਾਰੂਦ ਨੂੰ ਅੱਗ ਲਾਉਣੀ ਕਿੰਨੀ ਕੁ ਜਾਇਜ਼ ਹੈ? ਦੀਵਾਲੀ ਤੋਂ 20 ਦਿਨ ਪਹਿਲਾਂ ਦੁਸਹਿਰੇ ਵਾਲੇ ਦਿਨ ਰਾਵਣ ਦੇ ਪੁਤਲੇ ਜਲਾ ਕੇ ਬੁਰਾਈ 'ਤੇ ਸਚਾਈ ਦੀ ਜਿੱਤ ਦਰਸਾਈ ਜਾਂਦੀ ਹੈ ਪਰ ਰਾਵਣ ਦੇ ਲੱਖਾਂ ਪੁਤਲੇ ਜਲਣ ਵੇਲੇ ਜੋ ਹਵਾ 'ਚ ਪ੍ਰਦੂਸ਼ਣ ਫੈਲਾਉਂਦੇ ਹਨ, ਉਹ ਵੀ ਤਾਂ ਇਕ ਬੁਰਾਈ ਹੈ। ਅੱਜ ਲੋੜ ਹੈ ਸਾਡੇ ਅੰਦਰ ਤੇ ਸਮਾਜ 'ਚ ਵਿਚਰ ਰਹੇ ਅਸਲੀ ਰਾਵਣਾਂ ਨੂੰ ਪਛਾਨਣ ਦੀ। ਇਹ ਸੱਚ ਹੈ ਕਿ ਦੀਵਾਲੀ ਨੂੰ ਰੌਸ਼ਨੀਆਂ ਦਾ ਤਿਉਹਾਰ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਪਰ ਇਹ ਵੀ ਸੱਚ ਹੈ ਕਿ ਇਸ ਦਿਨ ਲਾਪਰਵਾਹੀ ਨਾਲ ਪਟਾਕੇ ਚਲਾਉਣ ਕਰਕੇ ਹਜ਼ਾਰਾਂ ਬੱਚੇ ਤੇ ਨੌਜਵਾਨ ਆਪਣੀਆਂ ਅੱਖਾਂ ਦੀ ਰੌਸ਼ਨੀ ਹਮੇਸ਼ਾ ਲਈ ਗਵਾ ਬਹਿੰਦੇ ਹਨ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਪਰਿਵਾਰਾਂ ਲਈ ਦੀਵਾਲੀ ਇਕ ਦਰਦਨਾਕ ਯਾਦ ਬਣ ਕੇ ਰਹਿ ਜਾਂਦੀ ਹੈ। ਅੱਜਕਲ੍ਹ ਪੂਰੀ ਦੁਨੀਆ ਵਿਚ ਵਾਤਾਵਰਨ ਨੂੰ ਹੋਰ ਗੰਦਲਾ ਹੋਣ ਤੋਂ ਬਚਾਉਣ ਦੀਆਂ ਗੱਲਾਂ ਤੇ ਸਕੀਮਾਂ ਚੱਲ ਰਹੀਆਂ ਹਨ। ਇਸ ਦੀ ਸਭ ਤੋਂ ਵੱਡੀ ਉਦਾਹਰਨ ਚੀਨ ਨੇ ਉਸ ਵੇਲੇ ਦਿੱਤੀ ਜੋ ਉਸ ਨੇ 2009 ਬੀਜਿੰਗ ਉਲੰਪਿਕ ਖੇਡਾਂ ਦੇ ਉਦਘਾਟਨ ਤੇ ਸਮਾਪਤੀ ਸਮਾਰੋਹ ਵਿਚ ਲੇਜ਼ਰ ਨਾਲ ਚੱਲਣ ਵਾਲੀਆਂ ਆਤਿਸ਼ਬਾਜ਼ੀਆਂ ਤੇ ਪਟਾਕਿਆਂ ਦੀ ਵਰਤੋਂ ਕੀਤੀ। ਇਨ੍ਹਾਂ ਧੂੰਆਂ ਰਹਿਤ ਪਟਾਕਿਆਂ ਤੇ ਆਤਿਸ਼ਬਾਜ਼ੀਆਂ ਨੇ ਲੋਕਾਂ ਦਾ ਮਨੋਰੰਜਨ ਵੀ ਕੀਤਾ ਤੇ ਹਵਾ ਨੂੰ ਵੀ ਦੂਸ਼ਿਤ ਨਹੀਂ ਕੀਤਾ। ਸ਼ਾਇਦ ਸਾਨੂੰ ਵੀ ਭਵਿੱਖ 'ਚ ਚੀਨ ਦੇ ਬਣੇ ਪਟਾਕੇ ਤੇ ਰਾਵਣ ਦੇ ਪੁਤਲਿਆਂ ਦੀ ਜ਼ਰੂਰਤ ਪਵੇ ਜਿਹੜੇ ਕਿ ਸਾਡੇ ਤਿਉਹਾਰ ਵੀ ਮਨਵਾ ਦੇਣ ਤੇ ਪ੍ਰਦੂਸ਼ਣ ਵੀ ਨਾ ਫੈਲਾਉਣ।
ਅਕਤੂਬਰ-ਨਵੰਬਰ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਵਾਤਾਵਰਨ ਲਈ ਸਭ ਤੋਂ ਖ਼ਤਰਨਾਕ ਮਹੀਨੇ ਹਨ ਕਿਉਂਕਿ ਇਨ੍ਹਾਂ ਮਹੀਨਿਆਂ 'ਚ ਦੁਸਹਿਰੇ ਦਾ ਧੂੰਆਂ, ਦੀਵਾਲੀ ਦਾ ਧੂੰਆਂ ਤੇ ਖੇਤਾਂ ਵਿਚ ਪਰਾਲੀ ਦਾ ਧੂੰਆਂ ਹਵਾ 'ਚ ਫੈਲਦਾ ਹੈ ਜੋ ਕਿ ਇਨ੍ਹਾਂ ਦਿਨਾਂ 'ਚ ਵੱਖ-ਵੱਖ ਹਾਦਸਿਆਂ ਤੇ ਬਿਮਾਰੀਆਂ ਦਾ ਕਾਰਨ ਬਣਦਾ ਹੈ। ਸ਼ਾਇਦ ਅਸੀਂ ਆਪਣੇ ਦਿਮਾਗ 'ਚ ਇਹ ਗੱਲ ਵਸਾ ਲਈ ਹੈ ਕਿ ਇਹ ਪਟਾਕਿਆਂ ਦੀਆਂ ਦੁਕਾਨਾਂ ਨੂੰ ਅੱਗ ਲੱਗਣ ਤੇ ਨਕਲੀ ਖੋਏ ਤੇ ਦੁੱਧ ਦੀਆਂ ਫੈਕਟਰੀਆਂ ਫੜਨ ਦੇ ਮਹੀਨੇ ਹਨ। ਵਿਦੇਸ਼ਾਂ 'ਚ ਵਸਦੇ ਭਾਰਤੀ ਵੀ ਦੀਵਾਲੀ ਮਨਾਉਂਦੇ ਹਨ ਪਰ ਉਥੇ ਦੇ ਕਾਨੂੰਨ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਵਾਤਾਵਰਨ ਨੂੰ ਦੂਸ਼ਿਤ ਕਰਨ ਦੀ ਆਗਿਆ ਨਹੀਂ ਦਿੰਦੇ। ਸਿਰਫ਼ ਘਰਾਂ ਦੇ ਬਾਹਰ ਦੀਪਮਾਲਾ ਤੇ ਘਰਾਂ 'ਚ ਮੋਮਬੱਤੀਆਂ ਜਗਾ ਕੇ ਤੇ ਗੁਰਦੁਆਰੇ ਜਾਂ ਮੰਦਿਰ 'ਚ ਮੱਥਾ ਟੇਕ ਕੇ ਦੀਵਾਲੀ ਮਨਾਈ ਜਾਂਦੀ ਹੈ ਪਰ ਅਸੀਂ 'ਦੀਵਾਲੀ 'ਤੇ ਕਿੰਨੇ ਹਜ਼ਾਰ ਦੇ ਪਟਾਕੇ ਚਲਾਏ' ਇਹ ਦੱਸ ਕੇ ਆਪਣੀ ਟੌਹਰ ਬਣਾਉਂਦੇ ਹਾਂ। ਬਹੁਤੇ ਵੱਡੇ ਲੀਡਰਾਂ ਜਾਂ ਅਫ਼ਸਰਾਂ ਲਈ ਤਾਂ ਦੀਵਾਲੀ ਭ੍ਰਿਸ਼ਟਾਚਾਰ ਦੇ ਇਕ ਬਦਲਵੇਂ ਰੂਪ ਵਿਚ ਸਾਹਮਣੇ ਆਉਂਦੀ ਹੈ ਕਿਉਂਕਿ ਉਸ ਦਿਨ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਮਿਲਣ ਵਾਲੇ ਬੇਹੱਦ ਕੀਮਤੀ ਤੋਹਫ਼ੇ ਅਸਲ 'ਚ ਰੰਗਦਾਰ ਕਾਗਜ਼ਾਂ 'ਚ ਲਪੇਟੀ ਹੋਈ ਰਿਸ਼ਵਤ ਹੀ ਹੁੰਦੀ ਹੈ। ਮੇਰੀ ਹੈਰਾਨੀ ਦੀ ਉਸ ਵੇਲੇ ਕੋਈ ਹੱਦ ਨਹੀਂ ਰਹਿੰਦੀ ਜਦੋਂ ਮੇਰੇ ਘਰ ਡਾਕ ਦੇਣ ਆਇਆ ਡਾਕੀਆ ਜਾਂ ਬਿਜਲੀ ਦਾ ਬਿੱਲ ਦੇਣ ਆਇਆ ਬਿਜਲੀ ਮੁਲਾਜ਼ਮ ਦੀਵਾਲੀ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਸ਼ਰੇਆਮ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ ਕਿ 'ਮਾਨ ਸਾਹਿਬ ਸਾਡੀ ਦੀਵਾਲੀ ਦਿਉ ਜੀ' ਮਤਲਬ ਸਰਕਾਰੀ ਮੁਲਾਜ਼ਮਾਂ ਵਾਸਤੇ ਦੀਵਾਲੀ ਦਾ ਤਿਉਹਾਰ ਰਿਸ਼ਵਤ ਲੈਣ ਦਾ ਇਕ ਜਾਇਜ਼ ਦਿਨ ਬਣ ਗਿਆ।
ਜੇ ਅਸੀਂ ਆਪਣੇ ਦੀਵਾਲੀ ਦੇ ਖਰਚਿਆਂ 'ਚ ਕਟੌਤੀ ਕਰਕੇ ਉਹੀ ਪੈਸੇ ਕਿਸੇ ਭੁੱਖੇ ਨੂੰ ਰੋਟੀ ਖੁਆਉਣ, ਕਿਸੇ ਗਰੀਬ ਦਾ ਇਲਾਜ ਕਰਾਉਣ ਜਾਂ ਕਿਸੇ ਲੋੜਵੰਦ ਬੱਚੇ ਨੂੰ ਪੜ੍ਹਾਉਣ ਲਈ ਵਰਤ ਕੇ ਹਰ ਸਾਲ ਦੀਵਾਲੀ ਮਨਾਈਏ ਤਾਂ ਸ਼ਾਇਦ ਸਾਨੂੰ ਪਟਾਕੇ ਜਾਂ ਅਨਾਰ ਬੰਬ ਚਲਾਉਣ ਨਾਲੋਂ ਵੱਧ ਸਕੂਨ ਮਿਲੇ। ਮੇਰੀ ਪ੍ਰਮਾਤਮਾ ਅੱਗੇ ਦੁਆ ਹੈ ਕਿ ਹਰ ਘਰ 'ਚ ਦੀਵਾਲੀ ਦੇ ਦੀਵੇ ਦੀ ਲੋਅ ਤੰਦਰੁਸਤੀ ਤੇ ਗਿਆਨ ਦਾ ਚਾਨਣ ਕਰੇ ਤੇ ਰੱਬ ਕਰਕੇ ਸਾਡੇ ਘਰਾਂ 'ਚੋਂ ਚੱਲ ਕੇ ਗਵਾਂਢੀਆਂ ਦੇ ਘਰ ਡਿੱਗਣ ਵਾਲੀ ਨਫ਼ਰਤ ਦੀ ਆਤਿਸ਼ਬਾਜ਼ੀ ਨੂੰ ਇਸ ਵਾਰ ਅੱਗ ਹੀ ਨਾ ਲੱਗੇ। ਅੱਜ ਵਕਤ ਆ ਗਿਆ ਹੈ ਜਦੋਂ ਸਾਨੂੰ ਆਪਣੇ ਤਿਉਹਾਰਾਂ ਜਾਂ ਰਸਮਾਂ-ਰਿਵਾਜਾਂ ਨੂੰ ਮਨਾਉਣ ਦੇ ਢੰਗ-ਤਰੀਕਿਆਂ 'ਤੇ ਗ਼ੌਰ ਕਰਨੀ ਚਾਹੀਦੀ ਹੈ ਤਾਂ ਕਿ ਤਿਉਹਾਰਾਂ ਦੀ ਅਹਿਮੀਅਤ ਵੀ ਕਾਇਮ ਰਹੇ ਤੇ ਨਾਲ-ਨਾਲ ਸਾਡੇ ਸਮਾਜਿਕ ਜੀਵਨ ਜਾਂ ਵਾਤਾਵਰਨ 'ਤੇ ਕੋਈ ਮਾਰੂ ਅਸਰ ਵੀ ਨਾ ਪਵੇ। ਕਿੰਨਾ ਚੰਗਾ ਹੁੰਦਾ ਜੇ ਸਾਡੇ ਦੇਸ਼ 'ਚ ਇਕ-ਦੂਜੇ 'ਤੇ ਰੰਗ ਪਾਉਣ ਤੇ ਪਟਾਕੇ ਚਲਾਉਣ ਵਾਲੇ ਤਿਉਹਾਰਾਂ ਦੇ ਨਾਲ-ਨਾਲ ਇਕ ਦਿਨ ਦਰੱਖਤ ਲਾਉਣ ਜਾਂ ਫੈਕਟਰੀਆਂ ਦਾ ਧੂੰਆਂ ਘਟਾਉਣ ਦਾ ਵੀ ਮਨਾਇਆ ਜਾਂਦਾ...
ਆਓ, ਸਾਰੇ ਦਿਮਾਗ ਵਾਲੀ ਦੀਪਮਾਲਾ ਜਗਾਈਏ,
ਭਾਈਚਾਰੇ ਦੇ ਦੀਵਿਆਂ 'ਚ ਸਾਂਝ ਦਾ ਤੇਲ ਪਾਈਏ,
ਚਲਾ ਲਈਆਂ ਬੜੀਆਂ, ਪਟਾਕਿਆਂ ਦੀਆਂ ਲੜੀਆਂ,
ਚਲੋ ਇਕ ਪਿਆਰ ਵਾਲੀ ਲੜੀ ਵੀ ਚਲਾਈਏ।
Saturday, October 23, 2010
Tuesday, October 5, 2010
Republic Youth Federation (RYF) Members Protested ............
Republic Youth Federation (RYF) Members
Protested Against Punjab Special Security Group Bill-2010 And Punjab
Prevention Of Damage To Public And Private Property Bill-2010
Passed In The Punjab Vidhan Sabha...................
Saturday, September 11, 2010
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